हैदराबाद: जब पिछले महीने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई तो लोगों को भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में गिरावट की उम्मीद थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि पिछले 11 दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ गए.
कोरोना वायरस की मार के चलते पूरी दुनिया के कारोबार पर असर पड़ रहा है. कच्चे तेल की कीमतें भी लगातार गिर रही हैं लेकिन कच्चे तेल के दाम में ऐतिहासिक गिरावट के बाद भी पेट्रोल-डीजल के दाम में लगातार 11 दिन बढ़ोतरी देखने को मिली. अब चर्चा का विषय यह बन गया है कि कच्चे तेल की कीमतें गिरने के बाद भी आखिर क्यों बढ़ रहे हैं पेट्रोल और डीजल के दाम.
पेट्रोलियम उत्पाद की कीमतें कई चीजों को देखते हुए तय कि जाती हैं. जिसमें भारत में कच्चे तेल के आयात पर उच्च निर्भरता, अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी, रुपये के बाहरी मूल्य में गिरावट, सरकार पर अस्थिर ईंधन सब्सिडी का बोझ, तेल विपणन कंपनियों के अंडर-रिकवरी / नुकसान आदि शामिल है.
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पेट्रोलियम पर मुनाफाखोरी
पहला, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और कमजोर रुपए की दलील. उदाहरण के लिए दिल्ली में पेट्रोल की कीमतों को लें. अलग-अलग विनिमय दरों और कच्चे तेल की कीमतों के साथ तीन अलग-अलग बिंदुओं के दौरान 2013 में प्रति बैरल क्रूड का मूल्य (159 लीटर) 111.59 डॉलर था.
वहीं रुपया-डॉलर विनिमय दर 66.89 थी. पर कच्चे की प्रति लीटर कीमत 44.94 थी. उस समय पेट्रोल 76.06 रुपये प्रति लीटर में बेचा गया था. इसी तरह 2018 में प्रति लीटर लागत, मौजूदा विनिमय दर और कच्चे तेल की कीमत में 33.90 रुपये के बराबर थी, जबकि पेट्रोल की कीमत इससे बहुत ज्यादा थी.
हाल की अवधि को देखते हुए इस साल अप्रैल में कच्चे तेल की कीमत 19.90 डॉलर से नीचे थी. विनिमय दर उच्च 75.27 रुपये थी, लेकिन पेट्रोल की कीमत 70 रुपये प्रति लीटर थी. इसलिए उच्च क्रूड और कमजोर रुपये का बहाना बेकार है.
दूसरा, तेल क्षेत्र की सब्सिडी के बोझ का दावा. सरकार के डेटा, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस आंकड़े, अपने स्वयं के दावे का खंडन करते हैं. 2017-18 में तेल क्षेत्र ने सरकार को 4,56,530 करोड़ रुपये का योगदान दिया. योगदान में शामिल हैं: कच्चे तेल से रॉयल्टी (12,057 करोड़ रुपये), गैस से रॉयल्टी (1722 करोड़ रुपये), तेल विकास उपकर (13,544 करोड़ रुपये), उत्पाद शुल्क और कस्टम शुल्क (2,13,012 करोड़ रुपये), बिक्री कर (1,86,394 करोड़ रुपये) और लाभांश (29,801 करोड़ रुपये). इसी तरह 2018-19 के लिए लाभ का अस्थायी अनुमान 4,33,062 करोड़ रुपये है.
तेल का खेल
सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2019-19 में कुल सब्सिडी में पेट्रोलियम क्षेत्र की हिस्सेदारी 8.3 प्रतिशत (24,833 करोड़ रुपये संशोधित अनुमान) से बढ़कर 11.1 प्रतिशत (37,478 करोड़ रुपये) हो गया है.