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कच्चे तेल की कीमत कम होने के बावजूद क्यों बढ़ रहें पेट्रोल के दाम? - कच्चे तेल की कीमत कम होने के बावजूद क्यों बढ़ रहें पेट्रोल के दाम?

कोरोना वायरस की मार के चलते पूरी दुनिया के कारोबार पर असर पड़ रहा है. कच्चे तेल की कीमतें भी लगातार गिर रही हैं लेकिन कच्चे तेल के दाम में ऐतिहासिक गिरावट के बाद भी पेट्रोल-डीजल के दाम में लगातार 11 दिन बढ़ोतरी देखने को मिली. अब चर्चा का विषय यह बन गया है कि कच्चे तेल की कीमतें गिरने के बाद भी आखिर क्यों बढ़ रहे हैं पेट्रोल और डीजल के दाम.

कच्चे तेल की कीमत कम होने के बावजूद क्यों बढ़ रहें पेट्रोल के दाम?
कच्चे तेल की कीमत कम होने के बावजूद क्यों बढ़ रहें पेट्रोल के दाम?

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Published : Jun 17, 2020, 11:19 AM IST

हैदराबाद: जब पिछले महीने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई तो लोगों को भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में गिरावट की उम्मीद थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि पिछले 11 दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ गए.

कोरोना वायरस की मार के चलते पूरी दुनिया के कारोबार पर असर पड़ रहा है. कच्चे तेल की कीमतें भी लगातार गिर रही हैं लेकिन कच्चे तेल के दाम में ऐतिहासिक गिरावट के बाद भी पेट्रोल-डीजल के दाम में लगातार 11 दिन बढ़ोतरी देखने को मिली. अब चर्चा का विषय यह बन गया है कि कच्चे तेल की कीमतें गिरने के बाद भी आखिर क्यों बढ़ रहे हैं पेट्रोल और डीजल के दाम.

पेट्रोलियम उत्पाद की कीमतें कई चीजों को देखते हुए तय कि जाती हैं. जिसमें भारत में कच्चे तेल के आयात पर उच्च निर्भरता, अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी, रुपये के बाहरी मूल्य में गिरावट, सरकार पर अस्थिर ईंधन सब्सिडी का बोझ, तेल विपणन कंपनियों के अंडर-रिकवरी / नुकसान आदि शामिल है.

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पेट्रोलियम पर मुनाफाखोरी

पहला, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और कमजोर रुपए की दलील. उदाहरण के लिए दिल्ली में पेट्रोल की कीमतों को लें. अलग-अलग विनिमय दरों और कच्चे तेल की कीमतों के साथ तीन अलग-अलग बिंदुओं के दौरान 2013 में प्रति बैरल क्रूड का मूल्य (159 लीटर) 111.59 डॉलर था.

2013, 2018 और 2020 में क्रूड और पेट्रोल की कीमत

वहीं रुपया-डॉलर विनिमय दर 66.89 थी. पर कच्चे की प्रति लीटर कीमत 44.94 थी. उस समय पेट्रोल 76.06 रुपये प्रति लीटर में बेचा गया था. इसी तरह 2018 में प्रति लीटर लागत, मौजूदा विनिमय दर और कच्चे तेल की कीमत में 33.90 रुपये के बराबर थी, जबकि पेट्रोल की कीमत इससे बहुत ज्यादा थी.

हाल की अवधि को देखते हुए इस साल अप्रैल में कच्चे तेल की कीमत 19.90 डॉलर से नीचे थी. विनिमय दर उच्च 75.27 रुपये थी, लेकिन पेट्रोल की कीमत 70 रुपये प्रति लीटर थी. इसलिए उच्च क्रूड और कमजोर रुपये का बहाना बेकार है.

दूसरा, तेल क्षेत्र की सब्सिडी के बोझ का दावा. सरकार के डेटा, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस आंकड़े, अपने स्वयं के दावे का खंडन करते हैं. 2017-18 में तेल क्षेत्र ने सरकार को 4,56,530 करोड़ रुपये का योगदान दिया. योगदान में शामिल हैं: कच्चे तेल से रॉयल्टी (12,057 करोड़ रुपये), गैस से रॉयल्टी (1722 करोड़ रुपये), तेल विकास उपकर (13,544 करोड़ रुपये), उत्पाद शुल्क और कस्टम शुल्क (2,13,012 करोड़ रुपये), बिक्री कर (1,86,394 करोड़ रुपये) और लाभांश (29,801 करोड़ रुपये). इसी तरह 2018-19 के लिए लाभ का अस्थायी अनुमान 4,33,062 करोड़ रुपये है.

तेल का खेल

सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2019-19 में कुल सब्सिडी में पेट्रोलियम क्षेत्र की हिस्सेदारी 8.3 प्रतिशत (24,833 करोड़ रुपये संशोधित अनुमान) से बढ़कर 11.1 प्रतिशत (37,478 करोड़ रुपये) हो गया है.

कच्चे तेल की कीमत कम होने के बावजूद क्यों बढ़ रहें पेट्रोल के दाम?

साल 2017-18 में सरकार की कुल सब्सिडी 2,24,455 करोड़ रुपये थी जिसमें भोजन पर सब्सिडी 1,00,282 करोड़ रुपये, उर्वरक 66,468 करोड़ रुपये, पेट्रोलियम 24,460 करोड़ रुपये, ब्याज सब्सिडी 22,146 करोड़ रुपये और अन्य सब्सिडी 11,099 करोड़ रुपये थी.

वहीं, 2019-20 के लिए कुल सब्सिडी का बजट 3,38,949 करोड़ रुपये था. इसका मतलब है कि पेट्रोलियम क्षेत्र सरकार की पूरी सब्सिडी का बोझ उठा रहा है.

नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2018-19 के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों द्वारा अर्जित शुद्ध लाभ 69,714 करोड़ रुपये था जो 2017-18 के 69,562 करोड़ रुपये से अधिक था. ओएनजीसी ने सबसे अधिक 26,716 करोड़ रुपये कमाए, इसके बाद आईओसीएल ने 16,894 करोड़ रुपये और बीपीसीएल ने 7,132 करोड़ रुपये कमाए थे.

तो, नुकसान का बहाना एक गलत गलत दावा है. अंडर रिकवरी नुकसान नहीं है. सरल शब्दों में अंडर-रिकवरी पेट्रोलियम उत्पाद की वास्तविक कीमत और एक मूल्यगत मूल्य के बीच का अंतर है.

पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है भारत

कच्चे आयात पर उच्च निर्भरता. यह सच है कि 213.22 एमएमटी (2018-19 के आंकड़े) की खपत के खिलाफ कच्चे तेल का घरेलू उत्पादन केवल 34.20 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) है, जिसका अर्थ है 84% आयात निर्भरता.

कच्चे तेल की कीमत कम होने के बावजूद क्यों बढ़ रहें पेट्रोल के दाम?

देश में कुल निर्यात का पेट्रोलियम उत्पाद 11.60 है. इसलिए, आयात निर्भरता उच्च पेट्रोल और डीजल की कीमतों के लिए एक अच्छा बहाना नहीं है.

सरकार को अब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि को रोकने के लिए कम से कम अपनी खराब पेट्रोल मूल्य निर्धारण नीति की समीक्षा करनी चाहिए.

कैसे तय होती है कीमत

अब यह जानते हैं कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत कैसे तय होती है. भारत में पेट्रोल और डीजल पर 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा केंद्र और राज्यों के टैक्स का होता है. आज जो पेट्रोल-डीजल हम खरीद रहे हैं, उसके लिए कच्चे तेल की करीब 23-25 दिन पहले की कीमत मायने रखती है, जो खाड़ी देशों से यहां तक पहुंचने का समय होता है.

(लेखक - डॉ पी. एस. एम. राव, अर्थशास्त्री. ऊपर व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं.)

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