नई दिल्ली : ईटीवी भारत ने मामले के बारे को गहराई से समझने के लिए एक विशेषज्ञ से बात की. पूर्व राजदूत अशोक सज्जनहर का कहना है कि बाइडेन प्रशासन द्वारा इस साल 11 सितंबर तक अफगानिस्तान से सभी सैनिकों को वापस लेने का निर्णय इंगित करता है कि अफगानिस्तान का भविष्य बहुत ही महत्वपूर्ण है. आने वाले कुछ वर्षों में अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव बढ़ता रहेगा.
ईटीवी भारत से बात करते हुए पूर्व राजदूत सज्जनहार ने कहा कि जहां तक निकासी की बात है, यह पिछले कुछ समय से हो रहा है. शांति समझौते के रूप में इसे 29 फरवरी 2020 को हस्ताक्षरित किया गया था और यह सहमति व्यक्त की गई थी कि अमेरिका 1 मई 2021 तक सभी सैनिकों को वापस बुला लेगा. समझौते पर हस्ताक्षर करने के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग 10,000-12,000 सैनिक थे. अब तक अमेरिका ने लगभग 8000 सैनिकों को वापस बुला लिया है और वहां लगभग 2,500 सैनिक ही बचे हैं.
यह दिखाता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका अफगानिस्तान छोड़ने के लिए बेताब है क्योंकि 20 साल से अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान में तैनात किया गया था. इसे कभी न खत्म होने वाले युद्ध की संज्ञा दी गई लेकिन अब अमेरिका ने अपना मन बना लिया है. हालांकि पेंटागन इस कदम का पूरी तरह से समर्थन नहीं कर सकता है क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर अमेरिका को सुरक्षित होना है तो अमेरिका को अफगानिस्तान में होना चाहिए.
लेकिन अफगानिस्तान के लिए इसका क्या मतलब है जो कि एक बड़ा सवालिया निशान है. क्योंकि कई समझौते हुए जिन पर तालिबान और अमेरिका ने हस्ताक्षर किए थे. संयोग से अशरफ गनी की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को इन सौदों से बाहर रखा गया था. तो मूल रूप से तालिबान को जो करना है वह है हिंसा को कम करना.
लेकिन न तो हिंसा में कमी आई है और न ही समझौके के अनुसार काम हुआ है. वास्तव में हिंसा कई गुना बढ़ गई है और अफगान सरकार के साथ बातचीत में तालिबान द्वारा कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है. यह उम्मीद की जा रही थी कि जब बाइडेन सत्ता में आएंगे तो अमेरिकी सैनिक थोड़े समय के लिए रुकेंगे लेकिन अब बाइडेन ने 11 सितंबर की समय सीमा तय की है.
इसलिए तालिबान का प्रभाव बढ़ता रहेगा क्योंकि तालिबान द्वारा जारी हिंसा के खिलाफ लड़ने के लिए अमेरिकी सेना और नाटो सेना अफगानिस्तान में नहीं होगी. हाल के सप्ताहों में अफगानों के खिलाफ हिंसा कई गुना बढ़ गई है. जिसमें सौ से अधिक अफगान सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं. महिलाओं पर अत्याचार जारी है. इस्लामिक माह रमजान के दौरान अपना उपवास तोड़ने पर दक्षिणी अफगान क्षेत्रीय राजधानी में एक बड़े विस्फोट में दर्जनों लोग मारे गए.
यह पूछे जाने पर कि क्या यह अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान से हटने का गलत निर्णय था और भारत, चीन, रूस, पाक सहित पड़ोसी देशों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा ? उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के दृष्टिकोण से यह एकमात्र निर्णय है क्योंकि पिछले 20 वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका ने 3000 सैनिकों को खो दिया है.
लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए हैं और अभी भी तालिबान के नियंत्रण वाले क्षेत्र बढ़ रहे हैं इसलिए अमेरिका को इससे बाहर निकलना पड़ा. लेकिन अब संयुक्त राज्य अमेरिका का कहना है कि अफगानिस्तान में अल-कायदा बलों को इतना अपमानित किया गया है कि वे अमेरिका के लिए खतरा पैदा नहीं करेंगे.