नई दिल्ली: तमिलनाडु सरकार ने कर्नाटक सरकार की महत्वाकांक्षी मेकेदातु परियोजना (Mekedatu project) के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है. तमिलनाडु सरकार ने शीर्ष कोर्ट में कहा है कि 67.16 टीएमसी फीट की क्षमता वाली मेकादातु परियोजना की योजना बनाना और 9000 करोड़ रुपये की लागत से 400 मेगावाट बिजली का उत्पादन कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के निर्णय का घोर उल्लंघन है.
'एकतरफा रिपोर्ट सीडब्ल्यूसी को भेजी'
तमिलनाडु ने अदालत को बताया कि कर्नाटक ने मेकेदातु परियोजना से जुड़ी जो रिपोर्ट केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) को भेजी वह एकतरफा है. सीडब्ल्यूसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने के बजाय प्रस्ताव पर विचार किया. इसमें कहा गया है कि इस परियोजना के परिणामस्वरूप कावेरी जलाशय के काबिनी उप बेसिन के अनियंत्रित जलग्रहण से कावेरी में उत्पन्न प्रवाह, केआरएस बांध के नीचे की ओर कावेरी नदी का जलग्रहण, शिमशा, अर्कावती और सुवर्णावती उप-घाटियों और विभिन्न अन्य से अनियंत्रित प्रवाह को रोक दिया जाएगा.
तमिलनाडु का कहना है कि कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित निर्माण का जून से सितंबर के महत्वपूर्ण महीनों के दौरान नदी के दैनिक और मासिक प्रवाह पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा. जैसा कि ट्रिब्यूनल के अंतिम आदेश में और इस अदालत का भी मानना है कि नदी से जुड़े जल पर लाखों निवासियों की आजीविका निर्भर करती है. तमिलनाडु का कहना है कि परियोजना के निर्माण से नदी के प्रवाह पर असर पड़ेगा. ऐसे में किसी नई योजना पर विचार किया जाना चाहिए.
तमिलनाडु ने सीडब्ल्यूसी को कर्नाटक द्वारा भेजी गई मेकादातु परियोजना रिपोर्ट को खारिज करने और पर्यावरण और वन मंत्रालय को परियोजना को मंजूरी देने से रोकने के लिए निर्देश देने की अपील की है.
क्या है मेकेदातु परियोजना?
यह पेयजल और बिजली उत्पादन पर 9,000 करोड़ रुपये की बांध परियोजना (dam project) है. मेकेदातु बांध का निर्माण कावेरी नदी (Kaveri River) पर मुग्गुरु वन क्षेत्र (Mugguru forest zone) के वॉचिंग टॉवर (watching tower) और रामनगर जिले (Ramanagar district) के हनूर वन क्षेत्र (Hanur forest zone) के बीच एक एकांत भूमि में किया जाएगा.