नारायणपुर : बस्तर प्राकृतिक,सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से बेहद ही संपन्न क्षेत्र है.यहां की देवी देवताओं का प्राचीन इतिहास भी बेहद ही समृद्ध एवं रोचक है.भौगोलिक विषमताओं और दुर्गम इलाकों के कारण यहां के देव स्थल,पर्यटन स्थल,महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. नारायणपुर जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर टिमनार गांव है.जहां हिरादाई और दुलारदई माता के नवनिर्मित मंदिर का उद्घाटन किया गया.इस दौरान बस्तर के पाटदेवता अंगा देव भी उपस्थित थे. इस अवसर पर प्रसिद्ध जात्रा कार्यक्रम का आयोजन हुआ. जिसमें करंगाल परगना क्षेत्र से देवी देवता शामिल हुए.
Narayanpur News : जात्रा में पाटेदव अंगा देव का हुआ आगमन ! - टिमनार गांव
हिरादाई और दुलारदई माता कई आदिवासी गांवों की कुलदेवी मानी गई हैं. टिमनार गांव में दोनों ही देवियों का भव्य मंदिर बनाया गया है.जिसका विधि विधान के साथ उद्घाटन किया गया है.जिसमें मुख्य रूप से बस्तर की सबसे शक्तिशाली और पूजे जाने वाले देव पाटदेव अंगा देव का आगमन हुआ.उनके साथ करंगाल परगना क्षेत्र के 30 से ज्यादा गांव के देवी देवता मौजूद थे.
![Narayanpur News : जात्रा में पाटेदव अंगा देव का हुआ आगमन ! Bastar famous deity Patdev participated in Jatra](https://etvbharatimages.akamaized.net/etvbharat/prod-images/1200-675-18525487-thumbnail-16x9-image-aspera.jpg)
तीन दिवसीय जात्रा का भव्य आयोजन :सोमवार से प्रारंभ हुई जात्रा में दूरदराज से देवी देवताओं का आगमन ग्राम टिमनार में हुआ. देवी देवताओं का प्रतीक अंगा देव,ढोली और अन्य देवताओं का शस्त्र लेकर देव पुजारी,गायता ,पटेल और सैकड़ों लोग पहुंचे.मंगलवार को दूसरे दिन सुबह देवी-देवताओं की नीति- नियम से पूजा अर्चना की गई. यहां पर दूर दराज से पहुंचे देवी देवता आपस में मिले . ढोल नगाड़ों की थाप पर आदिवासियों ने जमकर नृत्य किया. आसपास के हजारो श्रद्धालुओं ने नवनिर्मित मंदिर का दर्शन कर देवी-देवताओं का आशीर्वाद लिया.बुधवार को यहां पहुंचे देवी देवताओं की विदाई की रस्म है. जिसके बाद सभी अपने गंतव्य स्थान की ओर रवाना होंगे.
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पाटदेव अंगा देव का टिमनार गांव से रिश्ता :मिली जानकारी अनुसार बस्तर के जगदलपुर में विराजमान पाट देवता आंगादेव का जन्म स्थान ग्राम टिमनार था. बाद में पाट देवता को बस्तर के जगदलपुर लेकर जाया गया. यहां पहले नदी में पाट देवता का विसर्जन किया. लेकिन इंद्रावती नदी के बहाव के विपरीत आकर देव ऊपर आ गए. इसके बाद जगदलपुर के राजभाड़ा में पाटदेव को विराजमान किया गया है. आज भी गांव में कुछ भी समस्या होती है. तो पाटदेव को बुलाकर बताया जाता है. फिर जो नियम नीति देव बताते हैं. उस नीति को किया जाता है.