महासमुंद: छत्तीसगढ़ में भी कई बेहतरीन पर्यटक स्थल मौजूद हैं और इन्हीं में से एक है महासमुंद जिले में मौजूद सिरपुर. ये न केवल एक बेहतरीन पर्यटन स्थल है, बल्कि प्राचीन और पुरातात्विक धरोहर भी है. यहां हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों के साथ ही विशाल बौद्ध विहार और मठ मौजूद है, जो इस शहर के गौरवशाली इतिहास को दर्शाता है.
शिवपुर महानदी के तट पर बसा एक पुरातात्विक स्थल है, जिसका प्राचीन नाम श्रीपुरा है. श्रीपुरा दक्षिण कौशल कि सोमवंशी पांडूवंशी राजाओं की राजधानी थी यह एक विशाल नगर था. महानदी के किनारे बसे होने के कारण प्राचीन काल में यहां एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र मौजूद था, खुदाई के दौरान नदी किनारे मिले ये बाजार इसकी गवाही देते हैं.
खंडहर में तब्दील हुआ मंदिर
पांडूवंश के राजाओं के शासनकाल में यहां कई मंदिरों का निर्माण हुआ था. हर्ष गुप्त की पत्नी वसरादेवी ने अपने पति की स्मृति में प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर का निर्माण शुरू कराया था, जिसे बाद में उनके बेटे महाशिव गुप्त बाला अर्जुन ने पूरा कराया. छठी शताब्दी में बने लक्ष्मण मंदिर को देश में पहली बार ईंटों से बनाया गया है. लगभग 7 फीट ऊंचे पत्थरों से बने एक चबूतरे पर मंदिर का निर्माण हुआ है. लक्ष्मण मंदिर के पास ही राम मंदिर भी है लेकिन अब वो खंडहर हो चुका है.
गंगेश्वर रूप में पूजे जाते हैं शिव
सिरपुर का दूसरा प्रमुख पर्यटन स्थल गंगेश्वर महादेव का मंदिर है. महानदी के तट पर बने इस मंदिर में भगवान शिव की गंगेश्वर के रूप में पूजा होती है. नदी तट से लगे इस मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में बाला अर्जुन के समय में बाणासुर ने कराया था. इसके बारे में एक देव कथा प्रचलित है कि, बाला अर्जुन हमेशा शिव पूजा के लिए काशी जाया करते थे और वहां से एक शिवलिंग भी साथ में ले आते थे एक दिन भगवान शंकर प्रगट होकर बाणासुर से बोले कि तुम हमेशा पूजा करने काशी आते हो अब मैं शिरपुर में ही प्रकट हो रहा हूं तब वाणासुर ने कहा कि 'भगवान मैं सिरपुर में काफी संख्या में शिवलिंग स्थापित कर चुका हूं आप प्रकट होंगे तो कैसे पहचानूंगा. तब भगवान शंकर ने कहा कि 'जिस शिवलिंग से गंध का एहसास हो उसे ही स्थापित कर पूजा करो उत्तक से सिरपुर में शिव जी की पूजा गणेश्वर महादेव के रूप में होती है. अभी भी शिवलिंग से कभी सुमन तो कभी दुर्गंध का एहसास होता है, इसलिए ही यहां शिवजी को गंध ईश्वर के रूप में पूजते हैं.