सरगुजा: प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर सरगुजा वनों और पर्वतों से घिरा हुआ (Surguja is tourism center of Chhattisgarh) है. यही वजह है की सरगुजा के शहर भी बेहद खूबसूरत और आकर्षक हैं. ऐसे में यहां के वन, पर्वत, झरने इसे पर्यावरण हितैषी के साथ साथ पर्यटन का केंद्र भी बनाते (Information about tourist places in Surguja) हैं. यहां कई ऐसे अद्भुत स्थान हैं. जहां जाने के बाद आप या तो हैरत में पड़ जायेंगे या फिर प्रकृति के अनुपम रूप को देख रोमांचित हो उठेंगे. सरगुजा के इन 5 पर्यटन स्थलों में आप अपना वक्त बिता (Major tourist places in Surguja) सकते हैं.
सरगुजा में कई प्राकृतिक और मनोरम स्थान हैं जो लोगों को अपनी ओर खींचते हैं. यहां का उल्टा पानी सबसे ज्यादा विख्यात है. यहां पर पानी उल्टी दिशा में बहता है. गाड़ियों का चढ़ान की ओर लुढ़कना एक अद्भुत घटना प्रतीत होती है. इसके साथ ही जलजली पहुंचने पर कुदरत का एक और नायाब नमूना देखने को मिलता है जहां जमीन हिलती है. वो भी ऐसे जैसे कोई रबर की बॉल उछलती है. इसके बाद मैनपाट में प्रकृति के नायाब उदाहरण के तौर पर टाइगर प्वाइंट स्थित है. इसे देखने के बाद सारी थकान दूर हो जाती है. घनघोर वन क्षेत्र के बीच से बहती नदी और नदी के तेज प्रवाह का तीव्र गति से नीचे गिरना बेहद रोमांचक लगता है.
मैनपाट की खूबसूरत वादियां उल्टी दिशा में पानी का बहना अजूबा: मैनपाट में यूं तो बहुत से ऐसे स्थान हैं जो देखने और घूमने लायक हैं. लेकिन मुख्य रूप से यहां तीन स्थान बेहद रोमांचक हैं. इनमें सबसे पहले उल्टा पानी नामक स्थान है. जहां पानी की धार ढलान से चढ़ान की ओर चढ़ती है. यहां एक स्थान पर गाड़ियां भी बंद कर देने पर खुद चढ़ान की ओर लुढ़कने लगती हैं. ये नजारा लोगों को अचरज में डाल देता है. कुछ लोग इसे मैग्नेटिक फील्ड कहते हैं तो वहीं भू गर्भ शास्त्री इसे ऑप्टिकल इल्यूजन बताते हैं. सच चाहे जो भी हो पर्यटकों को ये नजारा बेहद पसंद आता है. ये भी पढ़ें: मानसून SPECIAL: छत्तीसगढ़ के शिमला को नहीं देखा तो क्या देखा ?
जानिए सरगुजा में कहां हिलती है जमीन:कुछ ही दूरी पर जलजली नामक प्वाइंट है जहां जमीन हिलती है. इस जमीन पर जम्प करने पर जमीन ऐसे हिचकोले खाती है मानो जमीन की सतह रबर से बनी हो. यह स्थान पर्यटकों को और खासकर बच्चों को बहुत भाता है. जानकर बताते हैं कि इस जमीन के नीचे पानी का बहाव है और ऊपर वन वनस्पति, डूब, मिट्टी की मोटी सतह जम गई है. जिस कारण यहां जमीन हिलती है. हालांकि सरगुजा में ऐसे अद्भुत नजरों के पीछे की मुख्य वजह ज्वालामुखी उद्गार माना जाता है. जानकारों के अनुसार सरगुजा छोटा नागपुर पठार का हिस्सा है. यह पठार ज्वालामुखी उद्गार से बना है. ऐसे पठारों में इस तरह की घटनाओं का होना सामान्य है.
टाइगर प्वाइंट देख टूरिस्ट होते हैं गदगद: सरगुजा काटाइगर प्वाइंट, यह स्थान घनघोर जंगल के बीच है. यहां पानी का तेज बहाव और फिर काफी ऊंचाई से गिरता झरना बेहद आकर्षक लगता है. प्रकृति के अनुपम नजारे लोगों को बेहद पसंद आते हैं. इस वाटर फॉल को ऊपर और नीचे दोनों ही स्थानों से देखा जा सकता है. हालांकि नीचे से देखने के लिये काफी नीचे सीढ़ियों से उतर कर जाना होता है. लेकिन नीचे का नजरा बेहद रोमांचक है
सरगुजा की प्राकृतिक सुंदरता और झरने सरगुजा के महेशपुर का खास महत्व:अम्बिकापुर से 60 किलोमीटर दूर अम्बिकापुर बिलासपुर मुख्य मार्ग में उदयपुर से करीब 7 किलोमीटर अंदर महेशपुर नाम की जगह है. यहां पुरातत्व विभाग ने प्राचीन मूर्ति और अवशेषों का विशाल संग्रह रखा है. रेण नदी के किनारे प्राचीन शिव मंदिर और पुरातात्विक महत्व के अवशेष देखने योग्य हैं.
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रामगढ़ का ऐतिहासिक महत्व:संभाग मुख्यालय अम्बिकापुर से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित है रामगढ़ पर्वत. मान्यता है कि 14 वर्ष के वनवास के दौरान भगवान राम यहां आए थे और अपनी सेना समेत विश्राम इसी पर्वत पर किया था. इस पर्वत पर कई अलग अलग गुफाएं है. माना जाता है कि, राम, लक्ष्मण और सीता इन गुफाओं में निवास करते थे. इन गुफाओं में मिलने वाले छिद्र इनके इंटरकनेक्ट होने के दावे की पुष्टि करते हैं कहावत है की एक गुफा से दूसरी गुफा में संवाद स्थापित करने के लिये गुफाओं में लंबा छिद्र कर गुफाओं को आपस मे इंटरकनेक्ट करने के लिए किया गया था. जो आज के मोबाइल फोन जैसा काम करता था. इसलिए यहां स्थित गुफाओं को सीताबेंगरा, लक्षमण बेंगरा कहा जाता है
महाकवि कालिदास की रचना स्थली रामगढ़ पर्वत पर नाट्यशाला:रामगढ़ पर्वत पर जाने पर सबसे पहले एक नाट्यशाला दिखाई देती है. जिसे देखकर ही लगता है कि, किसी बड़े आयोजन के लिये यहां मंच और लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई होगी. नाट्यशाला में जाने पर वहां पर गूंजती आवाज साउंड सिस्टम का अहसास कराती है. इन अद्भुत खूबियों की वजह से यह भी माना जाता है कि भरत मुनि ने इसी नाट्यशाला से प्रभावित होकर नाट्य शास्त्र की रचना की थी. रामगढ़ में हुई थी मेघदूत की रचना:मान्यता यह भी है कि इसी पर्वत पर बैठकर महाकवि कालीदास ने महाकाव्य मेघदूतम की रचना यहीं की थी. विरह में वो मेघों (बादलों) में पत्र लिख रहे थे और वो मेघ यहां से संदेशा लेकर जा रहे थे. इस अद्भुत संयोग को भी रामगढ़ से जोड़ा जाता है. जब कालिदास पत्नी विरह में पत्र लिख रहे थे वो दिन भी आषाढ़ महीने का पहला दिन था. काले घने मेघ आसमान में उमड़ रहे थे. इस लिये हर वर्ष जिला प्रशासन और पुरातत्व विभाग आषाढ़ महीने के पहले दिन यहां विभिन्न सांस्कृतिक और साहित्यिक आयोजन कराता है. जिसमें देश भर के साहित्यकार रामगढ़ पर अपने अपने शोध प्रस्तुत करते हैं.