नवादा: जिले के हिसुआ टीएस कॉलेज स्थित जय ज्वालानाथ मंदिर एक ऐतिहासिक शिव मंदिर है. प्राचीन मंदिर होने के कारण इसके इतिहास के बारे में कोई विशेष उल्लेख नहीं है. यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है और सावन माह में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है. शिव भक्त यहां माथा टेकने आते हैं. साथ ही मनोकामना पूरी होने की दुआएं मांगते हैं. यहां भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं.
मंदिर का हो रहा जीर्णोद्धार
मंदिर परिसर को आकर्षक बनाने के लिए मंदिर प्रबंधन कमेटी इसका जीर्णोद्धार बीते महीने से कर रही है. कुछ दिनों पहले मंदिर परिसर में प्रबंधन कमेटी द्वारा भगवान शिव, माता पार्वती, कार्तिकेय और गणेश की मूर्ति के साथ-साथ शिव के सवारी बसहा बैल की भी स्थापना वैदिक रीतियों और मंत्रो के बीच की गई. रविवार को मंदिर में स्थापित पुराने क्षतिग्रस्त बसहा बैल, मूर्तियां इत्यादि को कमेटी द्वारा बख्तियारपुर स्थित गंगा नदी में विसर्जित किया गया.
मंदिर की महिमा
मंदिर की महिमा के बारे में एक पुरानी कहानी को याद करते हुए भक्त सिंधुशरण बताते हैं कि गया के जमींदार को कोई संतान नहीं थी. इस वजह से वे सदा उदास रहते थे. एक बार उनकी मुलाकात मंदिर के पुजारी सूरज दास से हुई. पुजारी की सलाह पर उन्होंने मंदिर में माथा टेका और पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी. भगवान शिव की कृपा से उनकी पत्नी उसी माह गर्भवती हुई. लेकिन उन्होंने एक पुत्री को जन्म दिया. जमींदार बड़ा खुश हुआ और खुशी मन से मंदिर जाकर पुजारी सूरज दास से पुत्री की प्राप्ति के बारे में बताया. सूरज दास ने जमींदार को अगले सुबह ही पुत्री को अपनी पत्नी संग लाल वस्त्र में लपेट कर लाने को कहा. अगली सुबह जब जमींदार अपनी पुत्री को पुजारी सूरज दास के समक्ष ले गया तो उन्होंने बगैर छुए ही उस नवजात को शिव लिंग के समीप रखने को कहा. कुछ समय पश्चात पुजारी ने उस नवजात सहित जमींदार को घर जाने को कहा. साथ ही घर पहुंचने के बाद ही लपेटे हुए लाल कपड़े को हटाने को कहा. घर पहुंचने पर जमींदार ने जब लाल कपडे़ को हटाया तो जमींदार अचंभित हो गया. पुत्री वास्तव में पुत्र के रुप में परिवर्तित हो चुकी थी.
भगवान को है खुले में रहना पसंद
बता दें कि मंदिर और शिवालयों पर आकर्षक मंदिर रुपी गुंबज और अन्य प्रकार के छत होते हैं जो कंक्रीट के होते हैं. लेकिन टीएस कॉलेज स्थित जय ज्वालानाथ का मंदिर खुले आसमान में है. ऐसा नहीं कि किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. इस चमत्कार के बाद जमींदार ने भी मंदिर का निर्माण आरंभ किया था, लेकिन जैसे ही छत ढलाई के लिए सेंटिंग की जाती, वह धराशायी हो जाता था. कहा जाता है कि भगवान शंकर ने पुजारी के स्वप्न में आकर इसे खुला रहने का संदेश दिया था. जिसके बाद आज तक यह एक गोलाकार चारदीवारी में स्थापित है.