गया: वेद-पुराणों में गया जी के बारे में बताया गया है कि यहां पिंडदान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. पिंडदान (Pinddan) में खाद्य साम्रगी के साथ तिल का उपयोग किया जाता है. पिंडदानी जब गया जी में काला तिल और फल्गु के पानी से गया जी में आकर सिर्फ तर्पण कर देता है, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है. गया जी और तिल का संबंध यही से जुड़ जाता है. यह संबंध धार्मिक कर्मकांड से लेकर प्रसाद तक साथ-साथ घर तक जाता है. गया जी और तिल का संबंध धार्मिक दृष्टिकोण काफी गहरा है. कर्मकांड में तिल का उपयोग करने के बारे में कई वेद पुराणों में उल्लेख है.
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विष्णुपद क्षेत्र स्थित वैदिक मंत्रालय पाठशाला के राजाचार्य बताते हैं कि सनातन वेद पुराणों में बताया गया है काला तिल से तर्पण करने मात्र से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है. वहीं सफेद तिल से बना मिष्ठान ब्राह्मणों को खिलाने से पितर खुश हो जाते हैं. कर्मकांड में तिल का इतना महत्व है कि अगर कोई पुत्र काला तिल और जल लेकर दक्षिण दिशा में तर्पण करता है तो उनके पितृ तुरंत तृप्त हो जाते हैं. पितर गया जी में अपने पुत्र को आते देख काफी प्रसन्न हो जाते हैं. वो उत्सव मनाने लगते हैं.
इस दौरान पुत्र का प्रथम कर्तव्य होता है कि गया क्षेत्र में आते ही सबसे पहले स्नान करके काला तिल लेकर जल के साथ तर्पण करे. जिससे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है. वहीं तिल का संबंध सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि एक विशेष मिष्ठान्न से जुड़ा है. गया जी में 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में तिल से बना मिष्टान्न तिलकुट बनना शुरू हुआ. तिलकुट का औषधीय गुण और महीनों तक टिकने वाला मिष्ठान्न होने की वजह से देश-विदेश से आने वाले पिंडदानी इसे प्रसाद मानकर साथ ले जाते हैं.